सहर-एक नयी सुबह

कुछ बातें ऐसी भी होंती हैं जिसे आप ज़माने वालों को बताना चाहते हैं पैर कभी कभी आप कह नहीं सकते....मुझे ऐसा लगता है इस से बढ़िया तरीका कोई नहीं हो सकता है...कहीं इस से किसी का कुछ भला हो सके....
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सहर-एक नयी सुबह

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Thursday, January 21, 2010

ख़ामोश लेखनी

फूलों की वो महकती ख़ुश्बू
बारिश का वो भीगा पानी
और हवा में थी जो रवानी
क्या उस मौसम का खुमार लिखूं?


कुछ लिखना चाहता हूँ
सोचता हूँ क्या लिखूं?


थी चेहरे पर मेरी मासूमियत
आँखों में थी थोड़ी शरारत
और बातों में वो नज़ाकत
क्या अपना रंगीन मिज़ाज लिखूं?

कुछ लिखना चाहता हूँ
सोचता हूँ क्या लिखूं?


उनका आकर मुस्कुराना
जो रूठ जाऊं तो मानना
जाते जाते फिर रूलाना
क्या उनका ये अंदाज़ लिखूं?


कुछ लिखना चाहता हूँ
सोचता हूँ क्या लिखूं?


यादों में उनके आश्क़ बहाना
हर शाम एक दिया जलना
सोई उम्मीद को रोज़ जगाना
क्या उनका ये इंतज़ार-ए-बयान लिखूं?


कुछ लिखना चाहता हूँ
सोचता हूँ क्या लिखूं

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