लो रितुराज बन बैठा हूँ मैं यहाँ
तुम गीत अधरों पर सजाने लगीं
स्वपन सी साकार होती सृष्टी में
मंजरियाँ पुष्पों की सभी खिलाने लगीं
हो रागनी तुम ही तो मेरे कंठ की
गूंजती झन्कार बन जो गा रहीं
हो कोकिला बैठी हुई उस आम की
कूक से वेदना हृदय की जा रही
कह रही हो "छोड ह्रिदय के वार को
सामने पाने को है मन्ज़िल कई" और
"मै समय तुम समय की चाल हो
थक कर कभी जीवन कहीं रुकता नहीं"
शुन्य मैं, सोया हुआ सा नभ कोई
कौंध है अतुलित तुम्हि में, दामिनि
चीरती, निस्तब्ध्ता को भेद्ती
सामने तुम हो खडी, हे स्वामिनी
मैं तेज से तुम्हारे ही हुआ तेजस्वि
गान जिसकी ख्याती का है हो रहा
हूक से तुम्हरी मै हुन्कार उठा
हर तरफ़ कम्पन घरा पर हो रहा
जीवन समर में तुम हो मेरी सार्थी
कहीं दूर विपदा से मुझे लेजा रहीं
और सारे भ्रमांड में एक शंख की
विजय ध्वनि सी सहज ही गा रही
हाँ, मैं जीवन भर तेरा ऋणी हुआ
सत्या है पर बात कहने की नहीं
मोल तेरी बात का हर शब्द का
मैं चुका सक्ता कभी देवी नहीं
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