बहुत याद आती है वो शाम-ऐ -अलविदा
जब कहीं घुँघरू बजे,जब कहीं पायल बजे
जब कहीं कोयल कूके, जब कहीं पपीहा बोले
जब धारा गगन से मिले,जब पवन बदल में घुले
याद आती है वो शाम-ऐ-अलविदा
जब कोई वफ़ा-ऐ-दास्ताँ कहे
जब कोई कहीं दिल मिले,जब कहीं कोई गुल खिले
जब गाये भौरा रागिनी, जब चिटके कहीं चाँदनी
याद आती है वो शाम-ऐ-अलविदा
जब चले पुरवाईयाँ, जब मिले तन्हाईयाँ
जब करे कोई दिल बात,जब मिले दिल-ऐ-अघात
जब कोई परदे में रहे और हो जाए रुसवाईयां
याद आती है वो शाम-ऐ-अलविदा
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2 comments:
ONE OF THE BEST N BEAUTIFUL MIXTURE OF MODERN LITERATURE N CLASSICAL THINKING....
fantastic sir!!loved it!!
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